देश को रोशन करने की खातिर अपने घर बार सब कुछ बलिदान करने करने वाले भाखड़ा विस्थापित आज भी कई सुविधाओं से वंचित हैं। विडंबना यह है कि अभी तक 254 विस्थापितों को प्लॉट नहीं मिल पाए हैं। इस ज्वलंत विषय को लेकर प्रशासन हाल ही में एक हाई पावर कमेटी का गठन किया है और कमेटी पूरी जांच के बाद रिपोर्ट तैयार करेगी। कमेटी की सिफारिशों के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट राज्य सरकार के समक्ष सबमिट की जाएगी। सरकार की हरी झंडी मिलने के बाद अगली कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाएगा। प्रशासन की तरफ से जिला में एक हाई पावर कमेटी गठित की गई है। इस कमेटी के अध्यक्ष एडीसी बिलासपुर बनाए गए हैं, जबकि जबकि सहायक आयुक्त को मेंबर सेक्रेटरी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कमेटी में डीएफओ तथा संबंधित क्षेत्र के एसडीएम को भी सदस्य बनाया गया है। इस कमेटी का मुख्य कार्य प्लॉटों से अब तक वंचित रहे 254 विस्थापितों का विस्तृत आकलन करना है। इसके साथ ही यह भी जांच की जाएगी कि इनमें से कितने लोग अन्य परंपरागत वनवासी (ओटीएफडी) अधिनियम के दायरे में आते हैं।
जो पात्र पाए जाएंगे, उन्हें इस अधिनियम के तहत पुनर्वास का लाभ दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। बता दें कि 60 के दशक में गोबिंदसागर झील के आगोश में बिलासपुर का पुराना शहर और 205 गांव समा गए थे। तत्कालीन समय करीब 11,777 परिवार बेघर हो गए थे। बिलासपुर शहर के लोगों को बसाने के लिए नया बिलासपुर टाउन बनाया गया था और शहर के लोगों को तीन प्रकार के प्लॉट अलॉट किए गए थे। इसमें रेजिडेंशियल के 37.48 फीट का प्लॉट, हाऊस कम शॉप का 15.7 फीट का प्लॉट और तीसरा 15.30 फीट का दुकान का प्लॉट शामिल था, जबकि ग्रामीण क्षेत्र के कुछ विस्थापितों को घर को उनके घरों से कुछ दूरी पर जंगलों में प्लॉट दिए गए, जबकि कुछेक को हिसार आदि भेजा गया। साक्षरता की कमी से उस समय ग्रामीणों को जहां कहा गया, वहीं बस गए।
क्या कहते हैं उपायुक्त
उपायुक्त राहुल कुमार के अनुसार विस्थापितों की समस्याओं को हल करने के लिए एक हाई पावर कमेटी गठित की गई है। इस कमेटी की सिफारिशों के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर प्रदेश सरकार को प्रेषित की जाएगी।
सरकार की पहल सराही
जिला ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित सुधार समिति के अध्यक्ष देशराज शर्मा का कहना है कि प्रशासन की यह पहल बहुत की सराहनीय कदम है। इससे विस्थापितों को न्याय मिलने की पूरी उम्मीद है। सरकार व प्रशासन को भाखड़ा बहुल क्षेत्रों का मिनी सेटलमेंट करवाना चाहिए और विस्थापितों के कब्जे वाली भूमि का स्वामित्व प्रदान कर देना चाहिए। इससे ग्रामीणों को लाभ मिलेगा और उनके सिर पर लटक रही दोबारा से विस्थापित होने की तलवार हमेशा के लिए हट जाएगी।